ऐ मेरे दोस्त , जरा काफिले को गुजर जाने दे ,
उड़ती हुई इस गर्द को जमी पे तो ठहर जाने दे ,
फिर तलाशेंगे हम मिलकर कहीं मंज़िल अपनी ,
जब बरसने को हैं ये बादल तो बरस जाने दे ,
फिर तराशेंगे हम किसी पत्थर को , बुत बनायेंगे ,
बस किसी हूर सी सूरत को दिल में उतर जाने दे ,
इन उजालों से तो कहीं ज्यादा हसीन अंधेरे होंगे ,
बस जरा मेरे काँधे पे इन जुल्फों को बिखर जाने दे .
Thursday, September 10, 2009
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